विकास भारती की पहल, ताकि झारखंड निर्माण के सपने पूरे हों
देश भर में संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था मानो चरमरा रही है। तरह-तरह के गंठजोड़ और निहित स्वार्थी लोगों ने मानो पूरे सिस्टम को हाइजैक कर लिया है। जिम्मेवार पदों पर बैठे कतिपय लोगों की हरकतों के कारण नागरिकों में गहरी निराशा और असंतोष है। लोकतंत्र के स्तंभों के सामने विश्वसनीयता का गहरा संकट है। मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था से जनता का भरोसा उठता जा रहा है। इस स्थिति का भरपूर लाभ उग्रवादी और राष्ट्रविरोधी ताकतों को मिल रहा है। अराजकता का यह माहौल देश को गहरे संकट और अंधकारमय रास्ते की ओर ले जा रहा है। झारखंड जैसे राज्य में लगातार राजनीतिक अस्थिरता और अन्य कारणों से यह संकट कुछ ज्यादा ही गाढ़ा दिखता है। इसके कुछ प्रमुख लक्षण इन रूपों में देखे जा सकते हैं-
- दस साल में आठ मुख्यमंत्री, तीन बार राष्ट्रपति शासन, अब भी अल्पमत सरकार।
- पूर्व मुख्यमंत्री व कई मंत्री जेल में हैं और कई नौकरशाहों पर गंभीर मामले हैं।
- जेपीएससी और विधानसभा से लेकर अदालत जैसी संस्थाओं तक में नियुक्तियों व अन्य कार्यों में गंभीर आरोप।
- राज्य के 24 में से 22 जिले उग्रवाद की चपेट में हैं। विधायक महेंद्र सिंह, रमेश सिंह मुंडा, सांसद सुनील महतो जैसे लोगों की दिनदहाड़े हत्या भी मामूली चीज मानी जाने लगी है। संसद, विधानसभा और पंचायत तक के चुनावों में उग्रवादियों की मरजी चल रही है। कई सड़क मार्गों और रेल मार्गों पर रात में आवागमन बंद हो गया है। बहुतेरे इलाकों में तो दिन के वक्त भी घुसने की हिम्मत पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों के पास नहीं।
- सारी सिंचाई योजनाएं लूट का शिकार होकर अधूरी पड़ी हैं और सूखे खेतों के कारण रैयत पलायन को मजबूर हैं।
- कल-कारखानों और महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थाओं के लिए बार-बार वादे के बावजूद जमीन नहीं मिल रही है।
- प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के गांव कोदाईबांक में निर्माणाधीन पुल बह जाने का सिलसिला जुलाई 2011 में लगभग दर्जन भर पुल बह जाने के रूप में जारी है।
- झारखंड इंटरमीडिएट की परीक्षा में विज्ञान के 72 फीसदी बच्चे फेल हो गये जिनमें आइआइटी व अन्य महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग परीक्षा पास करने वाले बच्चे भी शामिल हैं। एक ही परीक्षा का सात बार परिणाम निकालने के बाद भी मूल्यांकन में शुद्धता की एक फीसदी भी गारंटी नहीं।
- अधिकारियों के तबादले, पदस्थापन और पदोन्नति को एक व्यवसाय का दरजा मिल गया है और लगातार मनमाने तबादलों ने सुशासन का मुंह चिढ़ाया है।
- सरकारी कार्यालयों में कार्यसंस्कृति और जवाबदेही का घनघोर अभाव है तथा हर मामूली काम के लिए जनता को बाबुओं के आगे गिड़गिड़ाना या दलालों का शिकार होना पड़ रहा है।
इन लक्षणों को राज्य में गहरे संकट के तौर पर देखा जाना चाहिए। राजनीतिकों के प्रति गहरे अविश्वास के इस माहौल में जनता को और विभिन्न रूपों में जनता की अगुवाई करने वाले लोगों को तत्काल पहल करनी चाहिए। ऐसे लोगों के समूह को सिविल सोसाइटी के नाम से जाना जाता है। अगर सिविल सोसाइटी ने तत्काल पहल नहीं की तो मौजूदा अराजक स्थिति का अधिकाधिक लाभ उग्रवादी और राष्ट्रविरोधी ताकतों को मिलेगा। साथ ही, लोकतांत्रिक संस्थाओं में उग्रवादियों के प्रतिनिधियों, रंगदारी और अपराध के सहारे चुनाव जीतने वाले या फिर धन के बल पर कारपोरेट के लोगों की संख्या बढ़ती जायेगी।
इसलिए समय रहते सिविल सोसाइटी की इस पहल के लिए विकास भारती ने झारखंड नवनिर्माण जनअभियान की परिकल्पना की है। लोकप्रिय शैली में इसे जनता मालिक आंदोलन कहा जायेगा। लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, यह एहसास दिलाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। इसके लिए सबसे पहले जनता में यह एहसास कराने की जरूरत है कि इस लोकतंत्र का मालिक जनता ही है। लोगों में ओनरशिप या मालिकाने की इस भावना के जरिये जनजागरूकता का काम सकारात्मक तरीके से करना इस अभियान का लक्ष्य होगा।
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इसे इन रूपों में चलाया जा सकता है-
1. इस अभियान को किसी परंपरागत ढांचे में ढालने के बजाय खुले मंच के बतौर चलाया जाये। इसके संयोजक के बतौर श्री अशोक भगत द्वारा जरूरी मार्गदर्शन दिये जायें। उनके अलावा राज्य भर के लगभग 100 लोगों की टीम हो जो अपने स्तर से पहल में सक्षम हो।
2. हर प्रकार के निर्माणाधीन विकास कार्य की निगरानी के लिए स्थानीय लोगों, लाभुक समुदाय के समूह बनें। ऐसे लोग प्रत्येक निर्माणाधीन काम के लिए सूचना का अधिकार के तहत काम के प्राक्कलन व खर्च के दस्तावेज लें। साथ ही, कार्य के दौरान सूचना का अधिकार के जरिये बार-बार निरीक्षण किया जाये, नमूने लिये जायें। इससे विकास राशि की लूट पर प्रभावी लगाम लग सकती है। साथ ही, जनता में चेतना व पहलकदमी जागृत होगी।
3. ग्राम पंचायतों के चुनाव के बावजूद नव निर्वाचित प्रतिनिधियों को सरकार ने किसी काम के लायक नहीं छोड़ा है। ऐसे लोगों की हताशा को हम सकारात्मक दिशा देने की कोशिश करें। उन्हें इस अभियान से जोड़ें।
4. यह एक गैर-राजनीतिक एवं सकारात्मक अभियान होगा। इसकी कार्यशैली विकास कार्यों में जुटी एजेंसियों को दुश्मन समझकर उनका छिद्रान्वेषण करना या आलोचना करना नहीं बल्कि उनके कामों पर एक सकारात्मक तरीके से नजर रखकर विकास कार्यों को गति देने वाली होगी। यह संबंधित एजेंसियों से जुड़े लोगों और उनके उच्चाधिकारियों के पास एक सकारात्मक संवाद का रास्ता बनाने से ही संभव है। आम तौर पर ऐसे अभियान के प्रारंभ में ही संबंधित एजेंसियां ऐसे लोगों के प्रति नकारात्मक दृष्टि रखने लगती है जिसके कारण संवाद का रास्ता नहीं रह जाता और अंततः आंदोलन के लोग अलग-थलग पड़ जाते हैं। जनता मालिक अभियान का मकसद आलोचना नहीं। उसके लिए बहुत सारे लोग हैं। इसका मकसद नियमित निगरानी एवं संवाद के जरिये प्रत्येक विकास कार्य को शत प्रतिशत लागू करना होगा। एक बार अगर यह अभियान अपनी ऐसी छवि बनाने में सफल हुआ तो देश भर में एक नया संदेश जायेगा और इन कार्यों से जुड़े वरीय अधिकारी तथा सरकार में बैठे लोग भी इस अभियान को आदर की नजर से देखते हुए इसके द्वारा उठाये गये मामलों पर गंभीर कदम उठाने को बाध्य होंगे।
5. इस अभियान में राज्य की सभी अधूरी परियोजनाओं को पूरा करने की दिशा में भी राज्य और केंद्र सरकार से सकारात्मक पहल की जायेगी। जनप्रतिनिधियों को इन मामलों पर गंभीर कदम उठाने के लिए तथ्यों, दस्तावेजों एवं प्रस्तावों या पत्रों के माध्यम से मदद की जायेगी। हम उन जनप्रतिनिधियों को संसद विधानसभाओं में उठाने के लिए सवाल बनाकर देंगे और नीति निर्माताओं के पास भेजने के लिए पत्र भी बनाकर दे देंगे, ताकि उन्हें वे अपने लेटरपैड पर लिखकर भेज दें। प्रारंभ में ऐसी चीजों का खास मतलब नहीं दिखेगा लेकिन जल्द ही ऐसे मामले जनता के दिलोदिमाग का हिस्सा बन जायेंगे। जिस तरह आज बिहार को विशेष दरजा देने की बात महज एक राजनीतिक नारा होने के बावजूद बिहारी जनमानस का अंग बन गयी है।
6. यह बुनियादी तौर पर जनता को इस लोकतंत्र का मालिक होने और इस नाते अपनी ओनरषिप का एहसास दिलाने के लिए चलाया गया अभियान होगा। किसी महंगी से महंगी चीज का भी कोई मालिक न हो तो वह सड़ जाती है। जबकि जिस चीज का कोई मालिक हो, वह सहेज कर रखी जाती है। किसी संयुक्त परिवार में कई संपत्तियों का मालिकाना तय नहीं होने से घर के कोई भी उस पर अपनी ओनरशिप का एहसास नहीं कर पाता। इसके कारण उसमें कोई मोह भी नहीं होता। लेकिन उसे मालिकाना मिलते ही वस्तु को सहेजकर रखता है। इसलिए हमें जनता में इस लोकतंत्र का मालिक होने, सारी सार्वजनिक वस्तुओं का मालिक होने का एहसास दिलाना है। यह एहसास लाने में सूचना का अधिकार एक जबरदस्त हथियार है। हर निर्माण कार्य एवं विकास कार्य के प्रारंभ होने से लेकर अंत तक उसकी निगरानी हो तो जनता में मालिकाने की भावना जबरदस्त रूप से जागृत होगी।
7. ग्राम पंचायतों के माध्यम से स्थानीय स्कूलों, अस्पतालों, डाकघरों, राशन वितरण, आंगनबाड़ी केंद्रों इत्यादि की व्यवस्था पर भी निगरानी रखने और सूचना का अधिकार के जरिये उसका हिसाब-किताब लेने से जनता मालिक की अवधारणा बलवती हो सकेगी।
8. स्थानीय विकास एवं निर्माण कार्यों तथा स्थानीय विशिष्टताओं का ठोस दस्तावेजीकरण करने की ठोस कोशिश की जाये। इसके लिए विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं, मीडिया संस्थाओं और स्वतंत्र बुद्धिजीवियों, सेवानिवृत लोगों की मदद ली जाये। हरेक को कुछ विशिष्ट मामले देकर उस पर हर संभव शोध एवं दस्तावेजीकरण करने का सहयोग मांगा जाये। ऐसी ठोस जानकारी देने वाली कुछ शोध योजनाओं के लिए भी राशि का इंतजाम किया जाये। ऐसे दस्तावेजों और शोधकार्यों का मकसद कोई अकादमिक या शोध के लिए शोध नहीं बल्कि राज-काज में ठोस बदलाव के प्रस्ताव बनाने और कुरसी पर बैठे लोगों को सकारात्मक सुझाव देकर विकास का हिस्सा बनना होगा।
9. मीडिया में आम तौर पर ऐसे सकारात्मक प्रयासों के लिए खास जगह नहीं होने की शिकायत मिलती है। लेकिन यह सच नहीं। अगर मीडिया में उच्च व जिम्मेवार पदो ंपर बैठे लोगों के साथ अपने मकसद पर गंभीर चर्चा करके उन्हें कुछ क्षेत्र विशेष एवं एजेंडा विशेष पर काम करने के लिए आग्रह किया जायेगा तो इसके अच्छे नतीजे निकल सकते हैं। इसके लिए अभियान के कुछ महत्वपूर्ण साथियों को मीडिया के वरीय एवं गंभीर लोगों के साथ निरंतर संवाद स्थापित करके ठोस एवं विशिष्ट प्रस्ताव, सुझाव देते रहने होंगे। साथ ही समय-समय पर मीडिया टीम के दौरे का भी प्रबंध करना होगा।
10. सकारात्मक नजरिये से विकास कार्यों में जुटे ऐसे 100 कार्यकत्र्ताओं को राज्य भर से चयनित करके उनके कार्यों पर आधार एक पुस्तक या स्मारिका का प्रकाशन किया जा सकता है। ऐसे लोगों को कुछ सांकेतिक राशि का पुरस्कार भी दिया जा सकता है। ऐसे प्रत्येक पुरस्कार के लिए राज्य भर से प्रायोजक तलाशे जा सकते हैं। ऐसे 100 पुरस्कार के लिए 100 प्रायोजकों की तलाश कोई मुश्किल नहीं। प्रायोजकों को किसी दिवंगत स्वजन के नाम पर पुरस्कार देने से भी हम नहीं रोकेंगे। इसके जरिये हम कार्यकर्ताओं के समाज के एक बड़े हिस्से का ध्यान अपने अभियान के प्रति आकृष्ट करा रहे होंगे।
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अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के अभियानों को मिले व्यापक जनसमर्थन से स्पष्ट है कि जनता को नेताओं में भरोसा नहीं। अब सिविल सोसाइटी- या इसे आप चाहे जो भी नाम दें- पर ही लोगों का भरोसा है। अगर इस भरोसे को जिंदा रखते हुए तत्काल गंभीर कदम नहीं उठाये गये तो पूरा देश गंभीर अराजकता के अंधेरे में डूब जायेगा। दुर्भाग्यवश, इसकी शुरूआत झारखंड से ही होगी या कौन जाने, हो ही चुकी है।
इसका जवाब जनता मालिक अभियान से ही निकलेगा। किसी राजनीतिक दल से फिलहाल तो कोई उम्मीद करना बेमानी है। लेकिन किसी राजनीतिक दल के कार्यकत्र्ता और उससे जुड़े जनप्रतिनिधि इस झारखंड नवनिर्माण जनअभियान के साथ ईमानदारी पूर्वक जुड़कर राज्य के हित में काम करेंगे तो उस दल को भी अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा हासिल करने और व्यापक जनता का भरोसा जीतने में मदद मिल सकती है।




